लाखों-करोड़ों खर्च के बाद भी मौत के साए – जंगल की सड़कों पर कटती रातें कोरिया जिले में गौमाता बेहाल..

कोरिया / पूर्व सरकार ने गौमाता की सेवा और संरक्षण के लिए लाखों-करोड़ों रुपये खर्च किए, योजनाएँ बनाईं, गौठान और पशु आश्रय स्थल तैयार किए गए। मगर सत्ता बदलते ही सड़कों पर पशुओं का जमावड़ा इंसान और पशु दोनों के लिए खतरा बन गया है। पशुओं के रहने का ठिकाना तो है, फिर भी उन्हें बेघर माना जा रहा है क्योंकि गौठान अब ठप पड़े हैं। कागज़ों में कई आदेश—निर्देश तो हैं, पर फिर भी गौ सड़क पर पड़ी हुई हैं।
ज़मीनी हकीकत कुछ और ही तस्वीर पेश कर रही है। जिले के कई क्षेत्रों में आज भी गौमाता खुले जंगलों और सड़कों पर रात काटने को मजबूर हैं।
सोनहत और आसपास के वनांचल इलाकों में सड़कों पर बैठे दर्जनों पशु रोज़ाना मौत के साए में जी रहे हैं। आए दिन तेज़ रफ़्तार वाहनों की चपेट में आने का ख़तरा बना रहता है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि पूर्व सरकार ने योजनाएँ शुरू की थीं और कुछ हद तक कार्य हुआ भी, पर अब धरातल पर उसका असर कहीं दिखाई नहीं देता।
जानकारी के अनुसार, जिले में करोड़ों की लागत से बनाए गए कई गौठान पिछले दो साल से उपयोगहीन पड़े हैं। जिन स्थानों पर पशुओं को सुरक्षित रखने की योजना थी, वहाँ अब जंगली घास और झाड़ियाँ उग आई हैं। वहीं, सड़कों और जंगल किनारे बेसहारा गायों का जमघट रोज़ देखा जा सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि रखरखाव और निगरानी की कमी के चलते यह स्थिति बनी है।
ज़रूरत है कि इस समस्या को गंभीरता से लिया जाए और सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ — ताकि गौमाता और लोगों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।




